Home छत्तीसगढ़ छिंद के पेड़ों से बदल रही दीदियों की किस्मत

छिंद के पेड़ों से बदल रही दीदियों की किस्मत

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वनांचल क्षेत्रों में अब तक छिंद के पेड़ों का उपयोग केवल रस (पेय) के रूप में किया जाता रहा है, जिससे ग्रामीणों को सीमित आय ही प्राप्त होती थी। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में सुकमा जिले के कोंटा विकासखण्ड के ग्राम सामसेट्टी में इस परंपरागत संसाधन को आजीविका का सशक्त माध्यम बनाने की अभिनव पहल की गई है। “नियद नेल्ला नार” कार्यक्रम के अंतर्गत राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन ‘बिहान’ के माध्यम से महिलाएं अब छिंद के रस से गुड़ का निर्माण कर आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ा रही हैं। सामान्यतः बस्तर एवं सुकमा अंचल में आजीविका का मुख्य साधन धान की खेती एवं लघु वनोपज संग्रहण रहा है। धान की एकमात्र फसल होने के कारण वर्ष के शेष समय रोजगार के अवसर सीमित रहते थे। इस चुनौती को अवसर में बदलते हुए छिंद गुड़ निर्माण का नवाचार प्रारंभ किया गया। ग्राम सामसेट्टी की दंतेश्वरी महिला स्व-सहायता समूह की 10 दीदियों ने इस पहल को अपनाया और दंतेवाड़ा से आए विशेषज्ञों के माध्यम से प्रशिक्षण प्राप्त किया। पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के सहयोग से इस गतिविधि से महिलाओं के कौशल विकास के साथ-साथ उनकी आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि हो रही है। इस पहल से प्रति परिवार औसतन 6 से 7 हजार रुपये की अतिरिक्त मासिक आय होगी। औषधीय गुणों से भरपूर छिंद गुड़ की बाजार में कीमत लगभग 350 रुपये प्रति किलोग्राम है। इससे पहले अनुपयोगी माने जाने वाले छिंद के पेड़ अब ग्रामीण आर्थिक सशक्तिकरण का आधार बन रहे हैं। “नियद नेल्ला नार” योजना के अंतर्गत पहल इस बात का प्रमाण है कि स्थानीय संसाधनों को आधुनिक तकनीक और प्रशिक्षण से जोड़कर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाया जा सकता है। सामसेट्टी की दीदियों की सफलता से प्रेरित होकर अब अन्य महिलाएं भी इस गतिविधि से जुड़ने के लिए आगे आ रही हैं। छिंद की यह मिठास अब सुकमा के विकास की नई कहानी लिख रही है।