ओमप्रकाश बघेल
देवभोग(समय दर्शन)
बांडी़गांव की पुष्पा यादव 65 के उम्र में भी रोटी, कपडा, मकान जैसी बुनियादी जरूरतो को पूरा करने में असमर्थ है।पुष्पा एक वृध्द महिला है जो सालो पहले अपने घर से निकाली जा चुकी है। बुढ़ापा अक्सर बचपन का दौर-ए-सानी हुआ करता है। बूढ़ी पुष्पा मे अपनी शिकायतों की तरफ़ मुख़ातिब करने का, रोने के सिवा कोई दूसरा ज़रिया नहीं है। आँखें हाथ, पैर सब जवाब दे चुके हैं। वो ब- आवाज बुलंद रोती है।पुष्पा को अब पेट भर रूखा दाना भी मुश्किल से मिलता है। कोई चुटकी लेकर भागता है तो कोई उन पर पानी की कुल्ली कर देता है। बूढ़ी पुष्पा अपनी अस्थायी अँधेरी कोठरी में ख़याल-ए-ग़म की तरह बैठी रहती है।बूढ़ी पुष्पा से जब मुलाकात हुई तो पुष्पा ने ना सर उठाया न रोईं न बोलीं, चुप-चाप रेंगती हुई वहां से अपने ठिकाने में चली गईं।सदमा ऐसा सख़्त था कि दिलो दिमाग की नस फाड़ दे दिल में ये फ़ैसला करके वो ख़ामोशी से बुलावे का इंतिज़ार करने लगीं।आखिरकार मुलाकात हुई। घरेलू हिंसा की शिकार पुष्पा के पति के चले जाते ही पुष्पा के जीवन से मानो सब कुछ चला गया। पुष्पा अपने पति की दूसरी पत्नी थी जो निसंतान है। बूढ़ी पीढी़ की यातना और अकेलेपन का बोध पुष्पा के परिस्थिति को देखकर साफ झलकता है। यह बेहद मार्मिक है कठिन है असहाय है फिर भी जीने की चाह ही पुष्पा की जिंदगी है। मैंने पूछा आज नया साल है उसने कहा कि मुझे पता नहीं मन में ख्याल आया साल तो नया है पर तकलीफ तो काफी पुराना है। परिस्थिति को देख एक शेर याद आया एक और ईंट गिर गई दीवार ए जिंदगी से नादान कह रहे हैं नया साल मुबारक हो। आज बूढ़े माता पिता को पुराने समान के रूप में देखने वाले बेटों का दारुण रुप हमारे समाज और परिवार की सच्चाई है। माता की ममतामय बांहो मे समा जाने वाले बेटा और अपने बेटे के सामने ममता कि प्रतिमुर्ति लगने वाली मां आज इस कड़कड़ाती ठंड मे अकेली भूख प्यासी लाचार दिख रही है। मैंने कहा मैं क्या कर सकता हूं उसने कहा गरमी आने से पहले मुझे कोई छांवदार जगह की जरुरत है मैंने झूठ भरे लहजे में कहा ठीक है परंतु मुझे पता है निसहाय लोगों को अपने कलम के स्याही के अलावा देने को कुछ नहीं है। पुष्पा को देख पता चला ना संघर्ष ख़त्म होता है ना ही शिकायतें धीरे धीरे जो खत्म हो रही है वो उम्र है । जो लोग मौत से भी नहीं डरते वो पुष्पा की जिंदगी देख ऐसी जिंदगी से जरूर डरेंगे। पुरानी पीढ़ी के लिए धीरे धीरे जगह खत्म होती जा रही है। अपमान तिरस्कार उपेक्षा से दुखित पुष्पा रुपी पुरानी पीढी अकेलेपन को स्वीकारना ज्यादा उचित समझती है ।क्या पुष्पा का कोई लेगा सुध…? पुष्पा को मिल पायेगा जीने की बुनियादी सुविधा…? या पुष्पा आकेले ही रह जायेगी



