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मूंछ न मुंडवाने की जिद ने छीन लिया था ‘महाभारत’ का रोल, फिर पंकज धीर को किस्मत ने बना दिया ‘कर्ण’

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भारतीय टेलीविजन इतिहास में बी आर चोपड़ा की ‘महाभारत’ में कर्ण की भूमिका निभाने वाले अभिनेता पंकज धीर का निधन हो गया है। इस खबर की पुष्टि ‘महाभारत’ में ही अर्जुन का किरदार निभाने वाले अभिनेता फिरोज खान ने की। पंकज का निधन बुधवार (15 अक्तूबर) सुबह 11:30 बजे हुआ। उनका अंतिम संस्कार शाम 4:30 बजे मुंबई के विले पार्ले में किया जाएगा।

पंकज धीर ने कर्ण का किरदार निभाकर दर्शकों के दिलों में अमिट छाप छोड़ी थी। मगर बहुत कम लोग जानते हैं कि पंकज धीर शुरुआत में अर्जुन की भूमिका के लिए चुने गए थे लेकिन मूंछें न मुंडवाने की वजह से उन्हें इस रोल से हाथ धोना पड़ा।

जब अर्जुन का रोल हाथ से फिसल गया
एक इंटरव्यू में पंकज धीर ने महाभारत में ‘कर्ण’ का किरदार मिलने को लेकर एक पुराना वाक्या बताया था। उस समय लेखकों और पैनल के सदस्यों – रही मासूम रज़ा, भृंग तुपकरी और पंडित नरेंद्र शर्मा – ने एकमत से कहा था कि वह अर्जुन के किरदार के लिए बिल्कुल फिट हैं। उन्होंने कॉन्ट्रैक्ट पर साइन भी कर दिया था। लेकिन तभी चोपड़ा साहब ने कहा कि अर्जुन के रूप में उन्हें बृहन्नला (अर्जुन का नपुंसक अवतार) की भूमिका भी निभानी होगी, जिसके लिए मूंछें हटानी जरूरी हैं।

पंकज धीर ने साफ मना कर दिया था। उन्होंने कहा कि उनका चेहरा मूंछों के साथ ही संतुलित दिखता है और बिना मूंछ के उनका लुक बदल जाएगा। बी आर चोपड़ा ने नाराज होकर उनसे कहा, ‘क्या आप वाकई एक्टर हैं? इतनी बड़ी भूमिका सिर्फ मूंछ के कारण छोड़ रहे हैं?’ और इसी के साथ उन्होंने पंकज को अपने ऑफिस से बाहर जाने के लिए कह दिया।

किस्मत का खेल- अर्जुन नहीं, बने कर्ण
छह महीने तक काम न मिलने के बाद, पंकज को दोबारा बीआर चोपड़ा का फोन आया। उन्होंने पूछा- ‘क्या तुम कर्ण का रोल करोगे?’ पंकज ने मजाक में कहा, ‘सर, इसमें मूंछें मुंडवानी तो नहीं पड़ेंगी?’ इस पर चोपड़ा साहब हंस पड़े और बोले, ‘नहीं।’ यही पल था जिसने पंकज धीर की किस्मत बदल दी। अर्जुन का रोल भले ही उनसे छिन गया, लेकिन कर्ण के रूप में उन्होंने जो लोकप्रियता हासिल की, वो किसी अर्जुन से कम नहीं थी।

किताबों और मंदिरों तक पहुंची कर्ण की छवि
‘महाभारत’ के प्रसारण के बाद पंकज धीर का चेहरा घर-घर में जाना जाने लगा। दर्शकों ने उन्हें न केवल पसंद किया बल्कि उनके निभाए किरदार कर्ण को इतना अपनाया कि उनकी तस्वीरें स्कूल की किताबों में कर्ण के चित्र के रूप में छापी जाने लगीं। यहां तक कि देश के कई हिस्सों में कर्ण के मंदिरों में उनकी मूर्तियों को भी पूजने की परंपरा शुरू हुई।

अर्जुन की जगह कर्ण बनना – एक वरदान
पंकज कई बार इस बात को स्वीकार कर चुके थे कि अर्जुन का किरदार न मिलना उनके लिए वरदान साबित हुआ। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था, ‘उस वक्त मैं नहीं समझ पाया कि मैंने क्या खोया, लेकिन अब जानता हूं कि ईश्वर ने जो दिया, वही मेरे लिए सही था। अगर अर्जुन बनता, तो शायद कर्ण जैसा प्रभाव कभी नहीं छोड़ पाता।’