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छत्तीसगढ़ कांग्रेस में अब आर पार ,चाटुकारों पर महंत का वार

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मनीष श्रीवास्तव (सह सम्पादक)

रायपुर। चौबे जी दुबे बनने चले थे, बन गए छब्बे।।

ये कहावत चरितार्थ हुई रविन्द्र चौबे पर अपनी चाटुकारिता और मिथिलबरा पन से प्रसिद्ध चौबे जी मध्यप्रदेश से लेकर छत्तीसगढ़ तक विभिन्न नेताओं की चाटुकारिता कर अनेक पद और कैबिनेट में शामिल हुए हैं, गिरगिट को भी मात देने वाले चौबे जी कभी भूपेश बघेल के खिलाफ जहर उगलते रहे थे।दिग्गी राजा के चाटुकार रहे चौबे जी छत्तीसगढ़ बनने पर नए आका की तलाश में अपने अग्रज प्रदीप चौबे के साथ रणनीति बनाने लगे थे,उस समय हालात ऐसे थे कि दुर्ग की राजनीति के चाणक्य वासुदेव चंद्राकर दाऊ चौबे परिवार की घास नहीं डाल रहे थे, अजीत जोगी छत्तीसगढ़ में पूरी कांग्रेस पार्टी को हाइजैक कर चुके थे, विद्या चरण शुक्ला अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे थे, चौबे बंधु अकेले रहकर ही समय का इंतजार कर रहे थे ,२००३ में जोगी जी की सत्ता जाते ही और विधायक खरीद के मामले में जोगी जी के निष्कासन होते ही अपनी दूरदर्शिता से प्रदीप चौबे जोगी परिवार में घुसने में सफल हो गए, अमित जोगी और रेणु जोगी को उन्होंने अपना मुरीद बना लिया,फिर तो सागौन बंगला में प्रदीप चौबे जी का वही स्थान हो गया जो कैबिनेट मंत्री रहते विद्या भईया के फॉर्म हाउस में कभी प्रदीप चौबे का हुआ करता था,दीमक बनकर महाराज एक एक जोगी जी के कट्टर समर्थक को उनसे दूर करते गए और ये सुनिश्चित करके कि उनकी इमारत खोखली हो गई है धीरे से दूरी बना ली,१५ साल रमन सरकार के एंटी इनकामबेंसी को सब समझ गए थे, और पूरे प्रदेश में रमन सरकार के खिलाफ माहौल बन चुका था पर अजीत जोगी जी अति आत्म आत्म विश्वास में ये समझ नहीं पाए कि उनका गढ़ित तब सही बैठता जब बीजेपी ३८.४० तक सीट लाती बीजेपी का सूपड़ा साफ होना तय था जोगी जी ७ विधायक बना कर भी सत्ता से बाहर निकल गए,ऐसे समय में चौबे परिवार ने पुनः मंथन किया कि कहा सटा जाए ताम्रध्वज साहू चौबे परिवार की राजनीति की शैली समझते थे वहां दाल नहीं गलती,बाबा तक पहुंच बनानी मुश्किल थी,तब दोनों बंधु ने तय किया कि रंग बदला जाए और एक लक्ष्मण और प्रतिमा चंद्राकर को साधे,दूसरा भूपेश बघेल की चरण वंदन करे , राजनीति में माहिर चौबे बंधु इस बार भी सफल हो गए ५ साल सत्ता की मलाई खाते रहे ,और अपनी बुद्धि से भूपेश बघेल के सबसे करीबी मंत्री बने रहे,,सत्ता गई भूपेश बघेल चारों तरफ से घिर गए पर चौबे परिवार को ये समझ थी कि प्रियंका गांधी और राहुल गांधी का हाथ अभी भी भूपेश बघेल पर है, और यही रणनीति उनकी भारी गलती साबित हो गई,, भुपेश ने जाती जनगणना करवा कर जो गलती की ,दिल्ली दरबार को सच्चाई पता चल गई की कुर्मी से ज्यादा यादव छत्तीसगढ़ में है और ये दोनों को जोड़ने पर भी जो आंकड़ा आता है उससे ज्यादा साहू यहां है और बीजेपी ने आदिवासी मुख्य मंत्री बना कर जो दांव खेला है,आने वाले समय में भूपेश की दावेदारी खारिज हो गई हैं और दीपक बैज ये सारे समीकरण समझते है, चौबे बंधु ने यही गलती कर दी भूपेश के मंच से नेतृत्व बदलने वाले बयान ने बैज को मौका दे दिया और उन्होंने रविन्द्र चौबे को निपटाने का रास्ता चुन लिया आने वाले समय में कोई ना कोई कार्यवाही होना तय है,,,शायद ये चौबे परिवार के ताबूत की आखिरी किल साबित हो।।।।।

चरण दास महंत के चमचे वाले बयान में उन्होंने रविन्द्र चौबे और दुर्ग ग्रामीण जिलाध्यक्ष की सीधे तौर से इशारे से बता दिया हैं कि हाइकमान अब किसी नेता को पार्टी का क्षत्रप बनने नहीं देगा, और दिल्ली दरबार से  इशारे के बाद ही  अनुशासनहीनता की कार्यवाही की अनुशंसा की गई है।वही दूसरी ओर भूपेश समर्थक दुर्ग ग्रामीण जिलाध्यक्ष ने मीटिंग में जैसी लड़ाई लड़ी उनकी स्थिति भी खराब होने वाली है, क्योंकि राहुल गांधी किसी भी व्यक्ति के वफादार जिला अध्यक्ष नहीं पार्टी के वफादार जिला अध्यक्ष चाहते है।क्या दीपक बैज और महंत जी ऐसे लोगों से पार्टी को मुक्त कर पाएंगे,ये आने वाला समय बताएगा।