गरियाबंद (संवाददाता). राज्य सरकार द्वारा शिक्षा गुणवत्ता वर्ष घोषित करने के बावजूद, गरियाबंद जिले में शिक्षा व्यवस्था गर्त में जाती दिख रही है। न्यायालय के आदेश और शासन के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद, जिले में दर्जनों शिक्षक अपने मूल कार्य – शिक्षण – को छोड़कर कार्यालयों में बाबूगिरी कर रहे हैं। इनकी प्रतिनियुक्ति, अटैचमेंट और नियमों के विपरीत मिला प्रभार शिक्षा के साथ खुलेआम मज़ाक बन गया है। आदिवासी क्षेत्र के छात्र छात्राओं की पढ़ाई हो रही प्रभावित विज्ञानं जैसे महत्वपूर्ण विषय के शिक्षक भी शिक्षकीय कार्य छोड़कर अफसर गिरी करने में व्यस्त है।
शिक्षक नहीं, अफसरों के निजी सहायक बन बैठे ‘गुरुजन’
कलेक्ट्रेट और अन्य कार्यालयों में संलग्न ये शिक्षक, शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले स्कूलों को भगवान भरोसे छोड़कर निर्माण कार्यों की फाइलें उठाने और बाबूगिरी में व्यस्त हैं। इनमें कुछ ऐसे भी हैं जिन पर गंभीर आरोप हैं, फिर भी वे कार्यालयों में मलाईदार पदों पर बने हुए हैं और अपने से उच्च शिक्षको को आदेशित कर रहे है।
नामजद शिक्षक और उनके विवादास्पद पद
1. खेल सिंह नायक – व्याख्याता, वर्तमान में जिला परियोजना समन्वयक, जबकि रिटायरमेंट मात्र कुछ महीनों दूर है। शासन के स्पष्ट निर्देश के बावजूद उन्हें वित्तीय प्रभार दिया गया है।
2. श्याम चंद्राकर – संस्कृत के व्याख्याता, परन्तु बिना योग्यता के सांख्यिकी अधिकारी बनाए गए। भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे।
3. बुद्धविलास सिंह – व्याख्याता, सहायक परियोजना अधिकारी (माध्यमिक), डीईओ के फर्जी हस्ताक्षर से चुनाव आयोग को पत्र भेजने का गंभीर आरोप।
4. महेश राम पटेल – व्याख्याता, वर्तमान में प्रभारी बीईओ, जबकि हाईकोर्ट के आदेश और शासनादेश के अनुसार वे इस पद के लिए अयोग्य हैं। शिक्षकों के एरियर आहरण का मामला भी ठंडे बस्ते में।
5. मनोज कुमार केला, भूपेंद्र सोनी, विल्सन पी थामसन – सभी शिक्षक/प्रधान पाठक हैं पर वर्षों से कार्यालयों में कार्यरत, छात्रों से कोसों दूर।
उच्च न्यायालय और शासन के आदेश की खुली अवहेलना
WPS 8244/2022 के अंतर्गत माननीय उच्च न्यायालय बिलासपुर ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि व्याख्याता को बीईओ नहीं बनाया जा सकता, फिर भी शासनादेश 14/03/2024 को धता बताते हुए महेश राम पटेल को बीईओ प्रभारी बना दिया गया।
आदिवासी अंचल के बच्चों के साथ अन्याय
इन शिक्षकों की अनुपस्थिति से स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी बनी हुई है, जिससे खासकर वनांचल क्षेत्र के आदिवासी बच्चे प्रभावित हो रहे हैं। ये वही शिक्षक हैं जिन्हें बच्चों को शिक्षित कर उनके भविष्य को संवारना था, पर वे कार्यालयों में चाय-पानी परोसने, फाइल उठाने और अधिकारियों के निजी कामों में लगे हैं।
अब सवाल उठता है – गरियाबंद के कलेक्टर भगवान सिंह उइके क्या इन सभी मामलों का संज्ञान लेकर दोषी शिक्षकों को स्कूल भेजेंगे? क्या शिक्षा गुणवत्ता वर्ष को वाकई अर्थपूर्ण बनाया जाएगा? क्या प्रदेश के मुख्यमंत्री जो तात्कालिक शिक्षा मंत्री भी है इन मसलो में सज्ञान लेंगे। या उनके नाक के निचे यह खेल चलता रहेगा।


