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भारतीय एथलीट हिमा दास ने रचा इतिहास

भारतीय एथलीट हिमा दास ने रचा इतिहास। फिनलैंड के टेम्पेयर शहर में आईएएएफ विश्व अंडर-20 एथलेटिक्स चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतने वालीं पहली भारतीय महिला बनीं

भारत की हिमा दास ने गुरुवार को आईएएएफ वर्ल्ड अंडर-20 चैंपियनशिप की महिलाओं की 400 मीटर स्पर्धा में स्वर्ण जीत कर इतिहास रचा दिया है।  हिमा ने फाइनल में 51.46 सेकेंड का समय निकालते हुए जीत हासिल की। इसी के साथ वह इस चैंपियनशिप में सभी आयु वर्गो में स्वर्ण जीतने वाली भारत की पहली महिला बन गई हैं।

खेलो की दुनिया में दिव प्रतिदन सफलता की नई ऊचाइयां छूते जा रहे भारतीय खिलाड़ियो के लिए गुरुवार को दिन एक नई उपलब्धी लेकर आया। इस दिन एक ऐसा कारनामा ट्रैक एंड फील्ड पर देखने को मिला जो आज तक कोई भी भारतीय एथलीट नही कर पाया था। भारत की युवा एथलीट हिमा दास ने फिनलैंड के टेम्पेयर शहर में इतिहास रचते हुए आईएएएफ विश्व अंडर-20 एथलेटिक्स चैंपियनशिप की 400 मीटर दौड़ में स्वर्ण जीतने में सफलता पाई। इसी के साथ हीमा विश्व स्तर पर ट्रैक स्पर्धा में गोल्ड मेडल जीतने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी बन गई हैं।

खिताब की प्रबल दावेदार 18 साल की हिमा दास ने 51 .46 सेकेंड के समय के साथ गोल्ड मेडल जीता। हालाकी वह 51 .13 सेकेंड के अपने निजी सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन से पीछे रहीं।  इसी के साथ वह इस चैंपियनशिप में सभी आयु वर्गो में स्वर्ण जीतने वाली भारत की पहली महिला बन गई हैं। उनसे पहले भाला फेंक के स्टार खिलाड़ी नीरज चोपड़ा ने 2016 में आयोजित हुई पिछली प्रतियोगिता में विश्व रिकॉर्ड के साथ स्वर्ण जीता था। असम की रहने वाली हिमा कुछ समय पहले आयोजित हुए राष्ट्रमंडल खेलों में छठे स्थान पर रहीं थीं। इसके बाद से वह लगातार अपना समय सुधारती रही हैं। हाल ही में उन्होंने अंतरराज्यीय चैंपियनशिप में भी 51.13 सेकंड के समय के साथ स्वर्ण जीता था।

हिमा दास को फेडरेशन कप से पहले कोई नहीं जानता था. मूलत: 100 और 200 मीटर की धाविका हिमा ने फेडरेशन कप में पहली बार 400 मीटर दौड़ में हिस्सा लिया और अपनी श्रेष्ठता साबित की थी । हीमा का यह तक का सफर आसान नही रहा। असम के नागौन जिले के ढींग गांव की रहने वाली हिमा दास के गांव की हालत बहुच अच्छे नही है। वो पांच भाई और बहनों में सबसे छोटी हैं, उनके पिता मुख्य रूप से धान की खेती करते हैं। उनके क्षेत्र में खेलों को ज्यादा तरजीह नहीं देते हैं, इसके अलावा उनके यहां ट्रेनिंग की व्यवस्था भी नहीं थी। हिमा दास अपने स्कूल में ही शौकिया रूप से खेत में ही फुटबॉल खेला करती थीं। बाद में वो लोकल क्लब के लिए खेलने लगी। इसी बीच साल 2016 में उनके टीचर ने उन्हें समझाया कि फुटबॉल में करियर बनाना कठिन है, इसलिए उन्हें किसी व्यक्तिगत इवेंट में ट्राई करना चाहिये।

उसके कुछ ही महीने बाद उन्होने खेत में ही स्प्रिंट की ट्रेनिंग करनी शुरू कर दी और गुहावाटी में आयोजित हुए 100 मीटर की रेस में भाग लिया। हालांकि उन्हें इस इवेंट में कांस्य पदक मिला लेकिन इसके बाद उन्हें अपने करियर में सही दिशा मिल गई। इसके बाद वो जूनियर स्तर पर असम के लिए नेशनल चैंपियनशिप में भाग लिया। इस प्रतियोगिता के फाइनल में जगह बनाकर उन्होने सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। इसके बाद हिमा के कोच उन्हें गुवाहाटी में लेकर आये।  हिमा दास को उनके कोच ने ट्रेनिंग देनी शुरू की और बहुत जल्द ही बेहतरीन स्पीड पकड़ने में सफल हो गईं।

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