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अभिनेता विनोद खन्ना को दादा साहेब फाल्के, श्रीदेवी को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार

आज दिल्ली के विज्ञान भवन में 65वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों के विजेताओँ को सम्मानित किया जा रहा है। यह पुरस्कार सिनेमा के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए दिए जाते हैं।

अभिनेता विनोद खन्ना को मरणोपरांत दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की घोषणा 13 अप्रैल को की गई थी जिनमें दिवंगत अदाकारा श्रीदेवी को उनकी फिल्म ‘मॉम’ के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री घोषित किया गया था। फिल्म ‘नगरकीर्तन’ के लिए रिद्धि सेन को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के पुरस्कार के लिए चुना गया। इस वर्ष के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में क्षेत्रीय फिल्मों का जलवा देखने को मिला है। एक रिपोर्ट उन क्षेत्रीय फ़िल्मों पर जो फ़िल्म पुरस्कारों में छा गई हैं।

राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में इस बार क्षेत्रीय फिल्मों की धूम रही। क्षेत्रीय फिल्मों के महत्व का बात इस बात से पता चलता है जब फीचर फिल्म के ज्यूरी के प्रमुख शेखर कपूर ने पुरस्कारों की घोषणा करने से पहले कहा था कि क्षेत्रीय सिनेमा की गुणवत्ता ने हमें स्तब्ध कर दिया है, ये विश्वस्तरीय है और अब क्षेत्रीय सिनेमा का टैग दूर करने का समय आ गया है। इस बार 65वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में मलयालम फिल्मों का जलवा रहा। मलयालम फिल्म भयानकम, थोंडिमुथलम द्रिकशाक्शियम और टेक ऑफ ने तीन-तीन पुरस्कार जीते।

मलयालम फिल्म ‘भयानकम’ की कहानी द्वितीय विश्व युद्ध के वक्त की है। कुट्टाडू गांव पर आधारित फिल्म गांववालों की नजर से युद्ध की विभीषिका बयां करती है जहां से 650 लोग हुकूमते-ब्रितानिया के लिए जंग लड़ने गए थे। एक डाकिया के जिम्मे उन सैनिकों की मौत की खबरें गांववालों तक पहुंचाने का काम आता है, और फिल्म इसी केंद्रीय पात्र के द्वंदों व गांववालों द्वारा उसे अपशगुनी मानने के इर्द-गिर्द अपनी कहानी रचती है।

इसी तरह दूसरी मलयालम फिल्म थोंडिमुथलम द्रिकशाक्शियम’ घरवालों की मर्जी के खिलाफ जाकर शादी करने वाले निम्नवर्गीय पति-पत्नी की कहानी है जिसमें कुछ वक्त बाद एक चोर मुख्य पात्र बन जाता है क्योंकि वो नायिका की सोने की चेन गले से निकाल कर पकड़े जाने से पहले निगल लेता है. उसे पकड़कर पास के ही पुलिस स्टेशन ले जाया जाता है, जहां वो चोरी करने की बात से ही इंकार कर देता है और वहां से फिल्म इतने दिलचस्प मोड़ लेती है कि दर्शकों को हैरान कर देती है।

इसी तरह तीन राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाली मलयालम फिल्म ‘टेक ऑफ’ में इस्लामिक स्टेट के नियंत्रण वाले वाले इराक में रहने वाली केरल की नर्सों की कहानी है। मुश्किल हालातों में हमेशा से जीने को मजबूर ये नर्सें जब और मुश्किल हालात में फंस जाती हैं, तब कैसे जिंदा रहने की कोशिशें करती हैं, इसी स्थिति को यथार्थवादी अंदाज में दिखाया गया है।

इसी तरह सामाजिक मुद्दों पर बनी सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार पाने वाली मलयालम फिल्म ‘आलुरुकम’ 75 वर्षीय वृद्ध पिता की कहानी है जो पहले अपने उस पुत्र को ढूंढ़ने निकलता है जो कि 16 साल पहले घर छोड़कर चला गया था और बाद में पुत्र को उसके नए रूप में स्वीकार नहीं कर पाता।

मूल रूप से तेलुगू में बनी फिल्म बाहुबली ने भी राष्ट्रीय पुरस्कारों में अपना जलवा दिखाते हुए सर्वश्रेष्ठ लोकप्रिय फिल्म, एक्शन निर्देशन और स्पेशल इफेक्टस के पुरस्कार जीते।

राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में असमिया फिल्म विलेज रॉकस्टार ने सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार जीता। ये फिल्म उत्तर पूर्व के एक सुदूर गांव के उन बच्चों की कहानी है जो रॉकस्टार बनने का सपना देखते हैं । इस फिल्म ने सर्वश्रेष्ठ बाल कलाकार, सर्वश्रेष्ठ संपादन और सर्वश्रेष्ठ लोकेशन साउंड का भी पुरस्कार जीता।

समलैंगिक प्रेम के इर्द-गिर्द घूमती बंगाली फिल्म नगर कीर्तन ने भी सर्वश्रेष्ठ अभिनेता सहित चार पुरस्कार जीते।

इस तरह इन क्षेत्रीय फिल्मों ने अपनी कहानी और अलग-अलग विधाओं के कारण पुरस्कार जीतकर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाना ये दिखाता है कि क्षेत्रीय सिनेमा दिन-ब-दिन और मजबूत हो रहा है जिससे न सिर्फ देशभर के दर्शकों को नई-नई कहानियां और नए-नए प्रयोग देखने को मिल रहे बल्कि भारतीय सिनेमा की एक नई पहचान उभर रही है।

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