Chhattisgarh

रावघाट में 6 माह का काम अब होगा सिर्फ एक महीने में,नई तकनीक का सहारा,ड्रोन से नक्सलियों पर नजर,साफ्टवेयर से 30 साल का रोडमैप तैयार

समय दर्शन:- नक्सल प्रभावित रावघाट में काम में तेजी लाने अब तकनीकी का सहारा लिया जा रहा है। खनन करने वाली कंपनी एसीबी ने 6 माह के कार्य को एक माह में करने नई योजनाएं तैयार की है। नई टेक्नोलॉजी से काम आसान हो गया है। नक्सलियों से बचने के लिए ड्रोन से क्षेत्र का सर्वे किया जा रहा है। साफ्टवेयर से आगामी 30 साल का प्लान तैयार किया गया है।

भिलाई स्टील प्लांट की खदान रावघाट में साल 2022 तक नियमित खनन शुरू करना है। इसके लिए सेटअप तैयार करने की कवायद चल रहा है। नक्सलियों से भी निपटने ड्रोन का सहारा लिया जा रहा है। इससे नक्सलियों की गतिविधियों पर नजर रखा जा सकता है। इससे काम पर असर नहीं पड़ेगा। एसीबी कंपनी का कहना है कि अब तक खनन से पहले मैनुअल सर्वे, ड्राइंग, डिजाइन, सेटअप आदि का रोडमैप तैयार होता था।

इस कार्य में छह माह से ज्यादा का समय लगता था। साथ ही श्रम भी अधिक लगता था। इसलिए कंपनी ने हाइटेक तैयारियां की है। सेटेलाइट का सहारा लिया। ड्रोन से खदान का सर्वे शुरू कर दिया गया है। बीएसएफ से सिक्योरिटी मिलने के बाद मंगलवार को इसका आगाज कर किया गया। नक्सलियों से बचने के लिए साफ्टवेयर की मदद से अगले 30 साल का मास्टर प्लान तैयार करने में आसानी होगी।

रावघाट के ब्लॉक-ए में खनन होना है। यहां की जमीन के नीचे किस क्वालिटी का आयरन ओर है, इसकी गुणवत्ता की जांच हो चुकी है। सैंपल लिए जा चुके हैं। 70 से 100 मीटर तक बोर किए जा चुके हैं। ड्रोन से सर्वे होने के बाद एरिया की विस्तृत जानकारी आदि को साफ्टवेयर पर अपलोड कर दिया जाएगा।

इसके बाद साफ्टवेयर खुद-ब-खुद हर प्वाइंट की रूपरेखा तैयार कर देगा। इसे तीस साल तक इस्तेमाल किया जा सकेगा। बेंच वाइज प्लान बना देगा। अब तक की व्यवस्था के तहत माइनिंग प्लान मैनुअल करना होता था। ड्रिल करने के बाद जानकारी लेकर उसे कम्प्यूटर में फीड करते थे। इसके बाद समय-समय पर मैनुअल प्लानिंग होती रही। मौके पर कर्मचारियों को नाप-जोख करना पड़ता था। इन सब झंझटों को छुटकारा मिलने का दावा किया जा रहा है।

कंपनी का कहना है कि रावघाट जैसे अति संवेदनशील एरिया में साफ्टवेयर से मौजूदा प्लानिंग के साथ आगामी 30 साल का रोडमैप तैयार होने से काम में तेजी आएगी। समय-समय पर होने वाली अड़चनों को दूर किया जा सकेगा।

30 साल बाद खदान के किस एरिया में कितना आयरन ओर बचेगा, कितनी गहराई तक खनन किया जा सकेगा, माइनिंग कब तक कर सकते हैं, समीप के कौन-कौन से एरिया में आयरन ओर का भंडार कितना है, ओर बर्डेन कितना, कचरा कितना है, यह सबकुछ साफ्टवेयर से पता चल सकेगा। सेटेलाइट की मदद से ही दो बेंच यानी अलग-अलग एरिया में किस क्वालिटी का आयरन है, इसकी जानकारी भी आसानी से मिल सकेगी। इन दोनों को मिलाने पर किस स्तर का आयरन तैयार हो सकेगा, इसकी भी जानकारी मिल सकेगी।

रावघाट के खनन एरिया का डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट-डीपीआर बनाने का रास्ता भी साफ होता जा रहा है। नक्सल प्रभावित एरिया में कर्मचारियों को बगैर सिक्योरिटी आसानी से पहुंचना संभव नहीं है। इसलिए कम मैनपॉवर के साथ ज्यादा काम करने पर अमल किया जा रहा है। विदेशों में अपनाई जाने वाली एडवांस टेक्नोलॉजी से सर्वे और डीपीआर तैयार किया जा रहा है। सरपैक और डीटीएम साफ्टवेयर से क्वालिटी और क्वांटिटी की भी पड़ताल होगी।

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