Chhattisgarh

बेरोजगारी, बँटवारा, बिखराव और विकास ? 

छत्तीसगढ़ में हैं करीब 21 लाख से अधिक शिक्षित बेरोजगार, दुर्ग जिला अव्वल, सुकमा भी पीछे नहीं…..

       छत्तीसगढ़ में कुल 20 लाख 53 हजार 556 लोग पढ़-लिखकर भी बेरोजगार हैं. बेरोजगारों का ये आंकड़ा उन लोगों का है, जिन्होंने रोजगार कार्यालय में अपना रजिस्ट्रेशन कराया है। छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में बेरोजगारों की संख्या सबसे ज्यादा है. यहां 2 लाख 69 हजार से अधिक पंजीकृत बेरोजगार हैं. वहीं सबसे कम बेरोजगार सुकमा जिले में  6825 के आस पास हैं. छत्तीसगढ़ विधानसभा में एक सवाल के जवाब में उच्च शिक्षा मंत्री प्रेमप्रकाश पांडेय ने यह जानकारी दी थी।
विधानसभा को उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के मुताबिक, राजधानी रायपुर में 1,07,157, दुर्ग में 2,69,000, बिलासपुर में 1,61,181, रायगढ़ में 1,60,106, जांजगीर-चांपा में 1,16,054, राजनांदगांव में 1,16,636, बालोद में 1,14,372 पढ़े-लिखे बेरोजगार हैं।
            इसी तरह बलौदाबाजार जिले में 94 हजार 185, कोरबा में 71 हजार 150, अंबिकापुर में 54 हजार 47, बीजापुर में 20083, धमतरी में 55786, दंतेवाड़ा में 21549, जगदलपुर में 32701, जशपुर में 78025, कांकेर में 61478, कोरबा में 71150, कवर्धा में 49351, कोरिया में 30868, महासमुंद में 38553, नारायणपुर में 16178, बेमेतरा में 48788, बलरामपुर में 20763, गरियाबंद में 38380, कोंडागांव में 47762, मुंगेला में 63175 और सूरजपुर जिले में 58138 बेरोजगार हैं.
एक अन्य सवाल के जवाब में शिक्षामंत्री ने बताया कि प्रदेश में वर्ष 2015 से 31 दिसंबर 2016 के बीच प्रदेश में 6 लाख 13 हजार 322 बेरोजगार थे. इसमें से 397 को रोजगार उपलब्ध कराया गया. वर्ष 2010-11 से 2016 तक 34191 को बेरोजगारी भत्ता दिया गया. नवंबर 2015 से इसे बंद कर दिया गया इसके अलावा वो भी बेरोजगार शामिल है जिन्होंने अपना पंजीयन रोजगार मैं नहीं कराया है उनकी संख्या भी लाखों मैं है।
        प्रदेश में आबादी वृद्धि के अनुपात में रोजगार का सृजन नहीं हो पा रहा है। प्रदेश के सभी जिलों में रोजगार मेल के आयोजन के बाद भी प्रदेश में जनवरी 2018 तक की स्थिति में 21 लाख से अधिक  पंजीकृत शिक्षित बेरोजगार है। हालांकि सरकार ने बेरोजगारी दूर करने और युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने मुख्यमंत्री कौशल विकास योजना संचालित कर रहा है। फिर भी युवाओं को पर्याप्त रोजगार नहीं मिल पा रहा है।
            बजरंगी भाईजान फि ल्म का वो सीन जब एक बच्ची शाहिदा (मुन्नी) को नायक उसके परिवार से मिलाने की कोशिस करता है……परंतु आज की स्थिति बहुत उलटी हो गई ही ग्रामीण परिवार एक रूपये के चावल के चक्कर मैं विघटित होते जा रहे है……..
             परिवारों का विघटन या टूटकर बिखरना बहुत ही दुखदाई है। भारतीय संस्कृति में परिवार एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण इकाई है। कभी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी कि इसमें कभी ऐसी स्थिति बन सकती है। इसका कारण चाहे कोई भी हो सकता है, पर इसका परिणाम  वास्तव में चिन्तनीय है। परिवार के हर सदस्य को चाहे-अनचाहे इस दंश को सहने के लिए विवश होना पड़ता है।
            एक रूपये चावल की चाहत में गरीबो का  परिवार आज बिखराव के कगार पर है समाजिक स्तर पर परिवार अब सयुक्त परिवार नहीं रह गए है यह बहुत ही गम्भीर विषय है विगत कुछ वर्ष मैं ग्रामीण स्तर पर गरीब परिवारों का विघटन बहुत तेजी से हुआ है।
         कुछ लोगों का मानना है कि जब लोग अनपढ़ हुआ करते थे तब परिवार एक होते थे। टूटते परिवारों के मूल में अक्सर पढ़े-लिखे लोग दिखाई देते हैं। इस वक्तव्य में कितनी सच्चाई है, इस पर विचार करने की आवस्यकता है इन लोगों का कथन है कि पढ़-लिखकर मनुष्य का दिमाग खराब हो जाता है। वह अपनी बराबरी में किसी को देखना नहीं चाहता। उसे अपने समक्ष सभी बौने प्रतीत होते हैं। उसे इस बात का अहं होता है कि उसने उच्च शिक्षा प्राप्त करके कोई किला फ तह कर लिया है।
        अपने उस नशे में आज युवा अपने माता-पिता को मूर्ख समझने की भूल करने लगा हैं। उसे सदा स्मरण रखना चाहिए कि़ यदि वे न होते तो उसकी यह जीवन यात्रा इतनी सरल न होती। दुनिया में मनुष्य के माता-पिता ही सिर्फ ऐसे होते हैं जो बिना किसी स्वार्थ के अपनी सन्तान से प्यार करते हैं। इसलिए अपनी सफलता का रौब उन्हें कभी नहीं दिखाना चाहिए। वे अपनी जिन्दगी को प्रसन्नता से स्वयं हार करके अपने बच्चों को जीवन में विजयी बनाते हैं, सफ ल बनाते हैं।
       मेरे विचार में अकेले पढाई-लिखाई को परिवारों के टूटने का कारण मानना पूर्णत: समीचीन नहीं होगा। इसका सबसे बड़ा कारण जो मुझे प्रतीत होता है, वह है आधुनिक जीवन शैली और नाम मात्र मूल्य मैं शासकीय सेवाएं उपलब्ध होना……
        “राशन में दो, तीन रुपये बिकने वाले गेहूं की लागत 24 रुपये, चावल 32 रुपये एक रूपये योजना का बोझ क्या कर के रूप में आम जनता पर?” 
               राशन के जरिए दो रुपये किलो बिकने वाले गेहूं और तीन रुपये किलो बिकने वाले चावल की आर्थिक लागत पिछले पांच साल के दौरान क्रमश: 26 प्रतिशत और लगभग 25 प्रतिशत वृद्धि के साथ 24 रुपये और 32 रुपये किलो तक पहुंच गयी है.
            लागत में कटौती की सरकारी एजेंसियों की कोशिशों के बावजूद राशन के जरिए दो रुपये किलो बिकने वाले गेहूं और तीन रुपये किलो बिकने वाले चावल की आर्थिक लागत पिछले पांच साल के दौरान क्रमश: 26 प्रतिशत और लगभग 25 प्रतिशत वृद्धि के साथ 24 रुपये और 32 रुपये किलो तक पहुंच गयी है. भारतीय खाद्य निगम के एक वरिष्ठ अधिकारी ने यह जानकारी दी.
          उन्होंने बताया कि 2017-18 में गेहूं की आर्थिक लागत 2408.67 रुपये प्रति क्विंटल (24.09 रपये किलो) जबकि चावल की 3264.23 रपये क्विंटल (32.6 रुपये किलो) रहने का अनुमान है. अधिकारी ने कहा कि न्यूनतम समर्थन मूल्य, मजदूरी और अन्य लागतें बढऩे से आर्थिक लागत बढ़ी है.
           वर्ष 2013-14 में गेहूं की प्रति क्विंटल लागत जहां 1908.32 रुपये यानी 19 रुपये किलो से कुछ अधिक थी, वहीं 2017-18 तक यह बढ़कर 2408.67 रुपये क्विंटल यानी 24.09 रुपये किलो हो गई। वहीं चावल की लागत 2013-14 में 2615.51 रुपये प्रति क्विंटल (26.15 रपये किलो) से बढ़कर 2017-18 में 3264.23 रुपये क्विंटल (32.6 रुपये किलो) हो गई. इस लिहाज से गेहूं की खरीद और उसके रखरखाव पर आने वाली लागत जहां प्रति क्विंटल 26.22 प्रतिशत बढ़ी वहीं चावल की लागत में इस दौरान 24.80 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है.
             किसानों से अनाज की खरीद करने से लेकर उसे बोरियों में भरकर गोदामों तक पहुंचाने और उसका रखरखाव करने वाले सार्वजनिक उपक्रम भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) को इस समय गेहूं पर 24 रुपये और चावल पर 32 रुपये किलो की लागत पड़ रही है जबकि राशन में इन अनाज को क्रमश: 2 रुपये, 3 रुपये किलो पर उपलब्ध कराया जाता है. आर्थिक लागत और बिक्री मूल्य में अंतर की भरपाई सरकार सब्सिडी के जरिये करती है.
            यह पूछे जाने पर कि लागत में कमी के लिये क्या कुछ कदम उठाये गये हैं, एफसीआई अधिकारी ने कहा, हमने कार्यबल को युक्तिसंगत बनाकर तथा कुछ अन्य अनावश्यक खर्चों को कम कर पिछले कुछ साल में 800 करोड़ रुपये की बचत की है. उन्होंने कहा, लेकिन एमएसपी, ब्याज और कर्मचारियों के वेतन आदि पर होने वाला खर्चा ऐसा है जहां हमारा कोई नियंत्रण नहीं है. हां, प्रशासनिक लागत है जहां कुछ किया जा सकता है जिसे हमने कुछ हद तक युक्तिसंगत बनाया है.
विषय गंभीर और सोचनीय है कि क्या शासकीय मदद वास्तव मैं क्या गरीबो की वास्तविक मदद है या शासकीय घाटे के साथ-साथ सामाजिक विघटन का अनदेखा पहलू यदि यह सहायता रोजगार के रूप मैं सम्भव होता तो बिखराव जो तेजी से विगत वर्षों में दिख रहा है वो नहीं होता।
           ”आज देखा जाए तो वर्तमान जरूरत रोजगार की आवश्यकता है चाहे वह ग्रामीण स्तर पर हो या पढ़े लिखे हुए बेरोजगार युवाओं के लिए न की 1 रूपए मैं निकम्मा बनाने की अनदेखी……समस्या जो सामाजिक स्तर पर गंभीर है।” 
डॉ. सत्येन्द्र कुमार सिंह
सह-सम्पादक एवं विधिक सलाहकार
समय दर्शन

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