Chhattisgarh

पत्थलगड़ी मुद्दा : आदिवासी बोले- सरकार हमें नक्सली बताने में लगी है, लेकिन हम डरेंगेे नहीं

अंबिकापुर.जशपुर से शुरू हुई पत्थलगड़ी मुहिम अंबिकापुर की ओर बढ़ती दिख रही है। रविवार को सर्व आदिवासी समाज ने यहां राजमोहिनी भवन में सम्मेलन कर इस मुद्दे पर एकजुटता दिखाई और कहा कि सरकार चाहे जो कर ले, यह अभियान बंद नहीं होगा।

पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविंद नेताम ने तो यहां तक कह दिया कि 1857 का स्वतंत्रता संग्राम अंग्रेजों के खिलाफ आदिवासियों ने शुरू किया था और आदिवासियों के सामने तब अंग्रेज नहीं टिक पाए तो चुनी हुई सरकार कहां टिक पाएगी। सम्मेलन में आदिवासियों ने जशपुर जिले में इस मुहिम के खिलाफ निकाली गई सद्भावना यात्रा और पत्थलगड़ी को तोड़े जाने की निंदा करते हुए मामले में शामिल लोगों पर एफआईआर कराने की मांग की। सम्मेलन में सरगुजा के अलावा जशपुर और रायगढ़ जिले के लोग शामिल हुए। इधर प्रदेश के गृहमंत्री रामसेवक पैकरा ने प्रेस कांफ्रेंस कर साफ कह दिया कि किसी भी हाल में पत्थलगड़ी नहीं चलने देंगे।

सम्मेलन में छाया रहा पत्थलगड़ी मुद्दा

आदिवासियों के 21 बिन्दुओं पर यह सम्मेलन बुलाया गया था लेकिन इसमें पत्थलगड़ी अभियान छाया रहा। सम्मेलन में शामिल समाज प्रमुखों ने इस मामले में सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि संवैधानिक व्यवस्था के तहत ची वाले क्षेत्रों में शांतिपूर्ण तरीके से जल, जंगल, जमीन की रक्षा के लिए पत्थलगड़ी कर रहे हैं। यह हमारा अधिकार है लेकिन सरकार हमें नक्सली और अराजक तत्व साबित करने में लग गई है। सरकार और प्रशासन के लोगों को पेसा एक्ट और ग्राम सभा के अधिकारों की जानकारी ही नहीं है। सरकार पांचवी अनुसूची को लेकर राजनीति न करे, ये हमारा अधिकार है और इसे लेकर रहेंगे।

कहा- जंगल जमीन सुरक्षित नहीं, इसलिए पत्थलगड़ी अभियान

पूर्व मंत्री अरविंद अरविंद नेताम ने इस मुद्दे पर सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि अगर आदिवासी इस बात को नहीं समझ रहे हैं तो सरकार को चाहिए था कि वो इन्हें समझाए न कि नक्सली साबित करे। उद्योगों के लिए आदिवासियों की जमीन लूटी जा रही है। जंगल और जमीन सुरक्षित नहीं है इसलिए पत्थलगड़ी अभियान शुरू किया गया है। भाजपा आरएएसएस के चश्मे से देख रही है। किसी भी हाल में यह अभियान बंद नहीं होने दिया जाएगा। सरकार दबाव बनाती है तो जन आंदोलन करेंगे। चुनाव में इसे मुद्दा बनाने जा रहे हैं। श्री नेताम ने भाजपा के साथ कांग्रेस पर भी निशाना साधते हुए कहा कि कांग्रेस इस मामले में खामोश है तो हम ये भी मानेंगे कि वह भी विरोधी है। सम्मेलन में सर्व आदिवासी समाज के प्रांताध्यक्ष वीपीए नेताम, फूल सिंह नेताम, आनंद प्रकाश टोप्पो, सोनऊ राम नेताम, जायसवाल सिंह ठाकुद, देवेंद्र नेताम, मोतीलाल पैकरा, एनएस मंडावी सहित समाज प्रमुख शामिल थे।

भाजपा हितैषी होती तो यहां आदिवासी सीएम होता-नेताम
पूर्व मंत्री नेताम ने भाजपा आदिवासियों की हितों की रक्षा नहीं कर रही है इसलिए पत्थलगड़ी अभियान शुरू हुआ। उन्होंने कहा कि भाजपा खुद को आदिवासियों की हितैषी बताती है। सरकार में बैठे लोग और भाजपा आदिवासियों के हितैषी होती तो यहां कोई आदिवासी सीएम होता। उन्होंने सवाल किया कि अादिवासी सीएम यहां नहीं होगा तो क्या पंजाब और हरियाणा में होगा। श्री नेताम ने कहा कि पार्टी के आदिवासी नेतृत्व पर हमला बोलते हुए कहा कि नेतृत्व सक्षम होता तो अपने अधिकारों के लिए सामाजिक आंदोलन शुरू नहीं करना पड़ता।

सम्मेलन में यह निर्णय लिया गया है पत्थलगड़ी में सामने के हिस्से में लिखा जाएगा- ‘आदिवासी क्षेत्र सावधान’ जबकि पिछले हिस्से में ‘गांव की समस्याएं’। सम्मेलन में आदिवासी समाज के लोगों ने आरोप लगाया कि सरकार के मंत्री और नेता इस पर राजनीति कर रहे हैं जिससे वर्ग संघर्ष की स्थिति निर्मित हो रही है।

पत्थलगड़ी को अभिशाप बताया

सम्मेलन में एक तरफ आदिवासियों ने पत्थलगड़ी के मुद्दे पर सरकार पर हमला बोला तो दूसरी तरफ गृहमंत्री रामसेवक पैकरा ने पार्टी के अनुसूचित जनजाति मोर्चा के नेताओं के साथ प्रेस कांफ्रेंस की और कहा कि किसी भी कीमत पर पत्थलगड़ी को चलने नहीं देंगे। पत्थलगड़ी अभिशाप की तरह है। भोले-भाले लोगों को भ्रमित किया जा रहा है।

बगावती तेवर पर गांववालों का टका सा जवाब- हम बोल नहीं पाते, इसलिए लिखकर मांग रहे अपना हक

पत्थरों पर संविधान की कुछ बातें लिखकर सरकार, प्रशासन और पूरे सिस्टम से परे काम कर रहे ग्रामीणों ने बगावती तेवर जशपुर के बाद अब सरगुजा जिलों में भी फैलाना शुरू किया है। ग्रामीणों से जब पूछा गया कि पत्थर क्यों गाड़ा तो उनका जवाब था कि हम आदिवासी बोल नहीं पाते, इसलिए पत्थरों पर लिखकर अपना अधिकार मांग रहे हैं। शनिवार को आदिवासी समुदाय के लोगों ने प्रशासनिक अफसरों को बंधक बनाने के बाद से यह साफ है कि उनके पीछे कोई न कोई ताकत जरूर है।

बाहरी लोगों की दखलअंदाजी नहीं चाहता आदिवासी समुदाय

जशपुर के बच्छरांव, बुटंगा आैर सिहारडांड से शुरू पत्थलगड़ी का प्रभाव पास के जिलों में भी दिखाई दे रहा है। रविवार को अंबिकापुर में सर्व आदिवासी समाज की इस लेकर बैठक भी हुई। आदिवासी समुदाय अपने जीवन में बाहरी लोगों की दखलअंदाजी नहीं चाहता। उनका कहना है कि विकास के नाम पर गांव, खेत, आैर जमीन उजाड़ने नहीं देंगे। जिले के बगीचा ब्लाॅक के बच्छरांव, बुटंगा, सिहारडांड समेत कलिया आैर आसपास के दर्जनभर ग्राम पंचायतों में पत्थरगड़ी की परंपरा नए सिरे से पांव पसार रही है। लेकिन गांव के लोगों का कहना है कि यह परंपरा काफी पुरानी है। वे बच्चों आैर अपने समुदाय के लोगों को पत्थर गाड़कर बनाए गए नियम- कानून की जानकारी दे रहे हैं। बुटंगा के लोगों का कहना है कि वे अपने इलाके में शांति चाहते हैं। काेई भी कंपनी, फैक्ट्री या खदान खोलकर उनके गांव और निजी जिंदगी को प्रभावित करते हैं। इससे वे अपने गांव में रहने से भी डरने लगते हैं। कई बार सड़क- पुल, नाली की मांग की, लेकिन कोई सुनवाई नहीं होती।

फैक्ट्री खुली लेकिन इसका लाभ नहीं मिल रहा है गांव के बेरोजगारों को
बच्छरांव के लोगों का कहना है कि गांव से लगे गुल्लू जलप्रपात वर्षों से जशपुर आने वाले सैलानियों को अपनी ओर खींचता रहा है। इसी जलप्रपात पर छत्तीसगढ़ हाइड्रो इलेक्ट्रिक पाॅवर प्राइवेट लिमिटेड बांध बनाकर 24 मेगावाट बिजली पैदा कर रहा है। 150 करोड़ के प्रोजेक्ट का ग्रामीण शुरू होने से पहले ही इसके खिलाफ खड़े हो गए थे। उनका आरोप है कि जबरिया जमीन अधिग्रहण किया गया, जिसका वे विरोध करते रहे, लेकिन आखिर में ये प्रोजेक्ट को लगने से नहीं रोक पाए। ग्रामीणों का कहना है कि बिजली उत्पादन हो रहा है तो उसका लाभ जशपुर जिले को मिलना चाहिए। लेकिन मांग के बावजूद नहीं मिल रहा है। वर्तमान में गांव के कई पढ़े- लिखे युवाओं को अब तक रोजगार नहीं मिल पाया है।

बादलखोल अभयारण्य का किया विरोध अब तक सड़क, बिजली और पानी नहीं
सिहारडांड के 70 साल के पलासिस मिंज बताते हैं कि 1981-82 में इलाके में खुलने वाले बादलखोल अभयारण्य का भी विरोध किया था। लेकिन कुछ नहीं हुआ। वे पूरी कोशिश में लगे रहे कि यहां अभ्यारण्य न बने लेकिन लोगों की नाराजगी काम नहीं आई। विरोध इसलिए भी था क्योंकि तब आदिवासियों को जंगल में जाने से रोकने की शुरुआत हुई। आदिवासी जल-जंगल-जमीन से जुड़े हैं। भला वे इस तरह की पाबंदी कैसे स्वीकार करते। वे कहते हैं कि पत्थरगड़ी का मकसद किसी का विरोध नहीं बल्कि अपने अधिकार को पाना है। सड़क, बिजली, पानी, पुल जैसी सुविधाएं आज भी नहीं हैं। प्रशासन उनकी पूछपरख नहीं करता। बैंक, अस्पताल जाने के लिए लंबी दूरी के साथ नदी पार करनी पड़ती है।

योजना का लाभ लेने सुराज में किया आवेदन पर निराकरण नहीं

जनवरी 2018 के लोक सुराज अभियान के दौरान बच्छरांव में उज्जवला गैस कनेक्शन, राशन कार्ड, बैल जोड़ी, सोलर पंप, तार घेरा सहित अन्य मांगों के सैकड़ों आवेदन मिले। ज्यादातर लोगों ने उज्जवला गैस कनेक्शन के लिए आवेदन किया, लेकिन उनका नाम सूची में नहीं होने की बात कहकर उन्हें इस योजना से वंचित रखा गया। कनेक्शन मांगने वालों में जिनीयूस खलखो, विनोद तिग्गा, जोसेफ एक्का, अनस्तसिया लकड़ा सहित ऐसे लोगों की लंबी फेहरिश्त है। राशन कार्डों के लिए कहा गया कि आवेदन मान्य करते हुए इसका निराकरण किया जा रहा है। एक-दो को छोड़कर किसी की मांग पूरी नहीं हुई।

70 साल के बाद भी पिछड़े
इन गांवों के लोगों का कहना है कि आजादी मिले 70 साल से ज्यादा हो गए हैं। संविधान की पांचवीं अनुसूची के तहत इलाके को विशेष दर्जा मिला हुआ है। लेकिन सरकार बनाए गए नियमों का पालन नहीं कर रही है। यही वजह है कि उन्हें पूरा अधिकार नहीं मिल पा रहा है। जबकि सरकार चाहे तो उन्हें पालन कराकर हक दिला सकती है।

पुलिस के रवैये से नाराज
बुटंगा गांव के लोग कानून व्यवस्था से खासे नाराज हैं। उनका कहना है कि छह माह पहले गांव की एक आदिवासी युवती की संदिग्ध मौत हुई थी। जिस युवक के साथ वह गई थी, उसके खिलाफ शिकायत पर पुलिस रिपोर्ट लिखने को तैयार नहीं थी। जब आसपास के तीन-चार गांव के लोग पहुंचे तब जुर्म दर्ज किया गया। लेकिन पुलिस ने आरोपी को छोड़ दिया। ऐसी कई घटनाएं यहां हुई जिसमें पुलिस झांकने तक नहीं आई।

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