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नोटबंदी के फैसले को छोड़कर मोदी ने जैसा काम किया, यदि यूपीए-3 होती तो वो भी वैसा ही करती

बिजनेस डेस्क. 2014 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की जीत इतनी निर्णायक रही कि अब किसी अन्य नतीजे की कल्पना करना मुश्किल है। लेकिन, कोशिश कर सकते हैं। कल्पना कीजिए मोदी की बजाय कांग्रेस नेतृत्व का गठबंधन घिसटते हुए जीत जाता। ऐसी स्थिति में वह अपने तीसरे कार्यकाल में कौन-सी आर्थिक नीतियां लागू कर सकता था? मोदी के पहले कार्यकाल में उनके इकॉनॉमिक रिकॉर्ड का मूल्यांकन करने के लिए सामने एक तथ्यात्मक काल्पनिक परिदृश्य जरूरी है। तीसरी यूपीए सरकार ऐसा पैमाना हो सकती है।

कांग्रेस नेतृत्व की सरकार मनरेगा और आधार कार्ड जैसी अपनी पसंदीदा योजनाओं को आगे बढ़ाती। वह रिजर्व बैंक को मुद्रास्फीति पर काबू पाने के उपाय करने की छूट देती। वह एयर इंडिया के समान घाटे में चल रहे सार्वजनिक संस्थानों के निजीकरण और श्रम कानूनों में सुधार करने से बचती। संभवत: वह क्रोनी कैपिटलिज्म की मदद के लिए आलोचना किए जाने के भय से बैंकों के बकाया कर्जों की समस्या को सुलझाने में देर कर सकती थी। अगला चुनाव निकट आने पर तीसरी यूपीए सरकार पहले की तरह किसानों को तोहफे देती। आंकड़ों की जादूगरी से वित्तीय लक्ष्यों को पूरा करने में अपनी नाकामी छिपाती। हालांकि, वह जीडीपी ग्रोथ और नौकरियों के मामले में थोड़ा सुधार करती।

कई योजनाएं रहीं यूपीए जैसी
अलबत्ता, यूपीए को तीसरा मौका नहीं मिला। लेकिन, साहसिक वादों के बावजूद अर्थव्यवस्था के मामले में मोदी का पहला कार्यकाल ऊपर बताए गए यूपीए के तीसरे काल्पनिक कार्यकाल के समान साबित हुआ है। मोदी के चुनाव जीतने के बाद जैसा हुआ है, संभवत: बहुत कुछ वैसा ही उनके हारने के बाद हो सकता था। लगभग 7% की जीडीपी ग्रोथ मोदी के सत्ता में आने से पहले के औसत से अलग नहीं है। भूमि या श्रम कानूनों में बड़े सुधार नहीं किए गए। रोजगार गारंटी योजना, आधार कार्ड चल रहे हैं। बैंकों के एनपीए की समस्या के हल में देर हुई है। सरकार की उपलब्धि यूपीए के प्रस्तावित जीएसटी को अमल में लाने की है। इस निरंतरता में आश्चर्य की बात नहीं है। भारत के राजनीतिक सिस्टम में संसद के उच्च सदन, अदालतों, सरकारी आॅडीटर और राज्यों के माध्यम से संतुलन की व्यवस्था है। कई सुधारों की अकेली या संयुक्त जिम्मेदारी इनकी है। हालांकि, मोदी की जीत के पीछे अधिक नौकरियों और कम घोटालों की आशा है लेकिन, वह उदार आर्थिक नीतियों के लिए नहीं है। सरकार के पूर्व आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम अपनी नई किताब- ऑफ काउंसिल में लिखते हैं, भारत में पूंजीवाद अब भी कलंकित है।

व्यापार बढ़ाने और भ्रष्टाचार घटाने में सरकार ने काम किया
मोदी ने पुराने ढर्रे से अलग हटकर कुछ काम तो किए हैं। यूपीए से लालफीताशाही पर काबू पाने या विदेशी निवेश के लिए जोरदार कोशिश करने की कल्पना नहीं की जा सकती थी। 2014 के बाद से ईज ऑफ डूइंग बिजनेस में विश्व बैंक की रैंकिंग में भारत 65 स्थान ऊपर गया है। मोदी ने मुद्रास्फीति पर विजय पाई है। उनकी सरकार ने गरीबों के बैंक खाते खोलने में मदद की है। कंपनियों के लिए नया दिवालिया कानून बनाया है। भ्रष्टाचार कम हो गया है। सुब्रमणियम स्वीकार करते हैं, फर्टिलाइजर सब्सिडी जारी है, फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य फिर बढ़ गए हैं। नए दिवालिया कानून के तहत बकाया मामलों के निपटने में लगभग छह वर्ष का समय लगेगा। ई-कॉमर्स नियमों में प्रस्तावित परिवर्तनों से अमेजॉन और वालमार्ट जैसी विदेशी कंपनियों को हिचक हो सकती है।

नोटबंदी और आंकड़े छिपाना खराब निर्णय
मोदी का सबसे इनोवेटिव निर्णय-नोटबंदी सबसे खराब निर्णय भी है। एक और चिंताजनक इनोवेशन ऐसे सरकारी डेटा को रोकना, संशोधित करना या उसे देर से पेश करना है, जो पक्ष में नहीं है। उसने रोजगार पर सांख्यिकी संगठन की रिपोर्ट रोकने की कोशिश की है। दुनिया कभी नहीं जान पाएगी कि तीसरी यूपीए सरकार के रहते क्या होता। और कम विश्वसनीय सरकारी आंकड़ों के रहते जानना मुश्किल है कि मोदी ने क्या किया होगा।

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